शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है,
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है
~ बशीर बद्र
दालानों की धूप छतों की शाम कहाँ,
घर के बाहर घर जैसा आराम कहाँ
~ बशीर बद्र
सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें
आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत
~ बशीर बद्र
यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नही,
मुझे गिलास बड़े दे, शराब कम कर दे.
न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की
~ बशीर बद्र
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
~ बशीर बद्र
न जी भर के देखा न कुछ बात की
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की
कह देना समुन्दर से हम ओस के मोती हैं
दरिया की तरह तुझ से मिलने नहीं आएँगे
ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है
जिंन्दगी धूप की पहेली थी
छाँव में बैठ के हल क्या होती
तुम मोहब्बत को खेल कहते हो
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता
~ बशीर बद्र
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