फिरते हैं 'मीर' ख़्वार कोई पूछता नहीं
इस आशिक़ी में इज़्ज़त-ए-सादात भी गई
~मीर तक़ी मीर
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
~मीर तक़ी मीर
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
~मीर तक़ी मीर
अब तो जाते हैं बुत-कदे से 'मीर'
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया
~मीर तक़ी मीर
किसू से दिल नहीं मिलता है या रब
हुआ था किस घड़ी उन से जुदा मैं
~मीर तक़ी मीर
यूँ नाकाम रहेंगे कब तक जी में है इक काम करें
रुस्वा हो कर मर जावें उस को भी बदनाम करें
~मीर तक़ी मीर
पढ़ते फिरेंगे गलियों में इन रेख़्तों को लोग
मुद्दत रहेंगी याद ये बातें हमारीयाँ
~मीर तक़ी मीर
दिल्ली के न थे कूचे औराक़-ए-मुसव्वर थे
जो शक्ल नज़र आई तस्वीर नज़र आई
~मीर तक़ी मीर
ख़ुदा को काम तो सौंपे हैं मैं ने सब लेकिन
रहे है ख़ौफ़ मुझे वाँ की बे-नियाज़ी का
~मीर तक़ी मीर
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